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इफ्तार के वक्त अल्लाह के करीब होता है रोजेदार रमजान पर विशेष

चक्रधरपुर : रसूल-ए-पाक सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया जब मुझे मेराज पर ले जाया गया, तो मैंने देखा कि मेरी उम्मत की बहुत सी औरतें सख्त अजाब में मुबतिला थी. उन के सिर के बाल जहन्नुम की दीवारों से बंधे हुए थे. ये वो औरतें थी जो अपने सिर के बाल गैर महरम से नहीं […]

चक्रधरपुर : रसूल-ए-पाक सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया जब मुझे मेराज पर ले जाया गया, तो मैंने देखा कि मेरी उम्मत की बहुत सी औरतें सख्त अजाब में मुबतिला थी. उन के सिर के बाल जहन्नुम की दीवारों से बंधे हुए थे. ये वो औरतें थी जो अपने सिर के बाल गैर महरम से नहीं छुपाती थी. कयामत के दिन जब परदे का सवाल किया जायेगा तो एक औरत चार जन्नती मर्दों को दोजख में लेकर जायेगी. इनमें बाप, भाई, शौहर, बेटा शामिल होगा.

ऐसा परदे का एहतराम नहीं करने की वजह से होगा. इसलिए रमजान में अपनी गुनाहों की माफी चाहें. अल्लाह के रसूल ने इरशाद फरमाया रोजादार के लिए दो खुशियां हैं. जब वह इफ्तार करता है तो खुश होता है और दूसरा जब वह अपने रब से मुलाकात करता है तो खुश होता है. इफ्तार के वक्त रोजेदार अल्लाह से बिल्कुल करीब होता है. इसलिए मांगी गयी हर दुआ मकबूल होती है. जो लोग इफ्तार के वक्त दस्तरखान पर बैठ कर गुफ्तगू करते हैं,
और दुनयावी बातों में मशगूल रहते हैं, अल्लाह से दुआ मांगने में सुस्ती और शर्म महसूस करते हैं, उनकी मिसाल बिल्कुल उस मजदूर जैसी है, जो सारा दिन मेहनत मशक्कत करे और शाम को अपनी उजरत (मेहनताना) लिए बगैर खाली हाथ अपने घर लौट जाये. इफ्तार के वक्त दुआ को अपना मामूल बना लें. क्योंकि यह वो वक्त होता है, जब बन्दा अपने रब के सबसे करीब होता है, और इस वक्त मांगी गयी दुआ रद्द नहीं होती, यकीनन कबूल होती है.
अल्लाह तआला हम सब पर अपना करम फरमाये और रमजान करीम की रहमतें और बरकतें अता फरमाये. अल्लाह के रसूल से इश्क करें. जैसा कि हजरते बिलाल ने किया था. जब मेरे आका ने हजरते बिलाल को काबे की छत पे चढ़या और हुक्म दिया कि ऐ बिलाल तुम अजान दो, तो हजरते बिलाल सोच में पड़ गये. जब दूसरी बार मेरे आका ने हुक्म दिया कि ऐ बिलाल तुम अजान दो, तो हजरते बिलाल फिर सोच में पड़ गये. तीसरी दफा मेरे आका ने हुक्म दिया कि बिलाल अजान का वक्त हो चुका है
अजान शुरू करो, तब हजरते बिलाल ने कहा हुजूर आप पर मेरे मां बाप कुरबान, जब मैं जमीन पे अजान देता था तो काबे की तरफ रुख करके अजान देता था अब तो आप ने काबे की छत पे चढ़ा दिया है, मैं रुख किधर करके अजान दूं. तब मेरे आका ने हुक्म दिया, बिलाल तुम मेरी तरफ रुख करदो और अजान दो. कितना बुलंद मेरे नबी का मकाम है. सारा जमाना पढ़ता उनपे दरूदोसलाम है. आप अपने दिन का आगाज सदका देने से शुरू करो उस दिन तुम्हारी कोई दुआ रद्द नहीं की जायेगी, और अच्छी बात बताना और दूसरों को देख कर मुस्कुराना भी
सदका है.
प्रस्तुतकर्ता : मो सलीम अख्तर, सदर मुसलिम पंचायत बंगलाटांड
Prabhat Khabar Digital Desk
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