यूपी चुनाव: खूब लग रहे जीत–हार के कयास

!!कृष्ण प्रताप सिंह!!... लखनऊ : यूपी चुनाव के पहले चरण के लिए नामजदगी की शुरुआत के साथ ही प्रत्याशियों के हार और जीत के कयास लगने भी शुरू हो गये हैं. आश्चर्यजनक यह है कि इस बार कयास लगानेवाले पिछले चुनावों जैसे बड़बोलेपन से बच रहे और कुतर्क करने के बजाय वस्तुनिष्ठता व सतर्कता बरत […]

By Prabhat Khabar Digital Desk | January 20, 2017 8:33 AM

!!कृष्ण प्रताप सिंह!!

लखनऊ : यूपी चुनाव के पहले चरण के लिए नामजदगी की शुरुआत के साथ ही प्रत्याशियों के हार और जीत के कयास लगने भी शुरू हो गये हैं. आश्चर्यजनक यह है कि इस बार कयास लगानेवाले पिछले चुनावों जैसे बड़बोलेपन से बच रहे और कुतर्क करने के बजाय वस्तुनिष्ठता व सतर्कता बरत रहे हैं. पहले चुनाव में जहां नतीजे आने तक छोटे-बड़े सारे दल, यहां तक कि वे प्रत्याशी भी, जिनकी जमानत बचने के भी आसार नहीं होते थे, ‘भारी जीत’ की डींगें हांकते नजर आते थे, इस बार सपा, बसपा, भाजपा व कांग्रेस जैसे बड़े दल भी ‘भारी बहुमत’ के दावे से परहेज करते नजर आ रहे हैं.

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 403 में 300 सीटें जीतने का बड़ा दावा किया भी है, तो इस शर्त पर कि उनकी पार्टी का कांग्रेस से गंठबंधन हो जाये. दूसरी ओर न्यूज चैनलों पर पिछले दिनों प्रसारित ओपिनियन पोल व सर्वेक्षणों ने अजब तमाशा खड़ा कर रखा है. इनमें से किसी में सपा के अखिलेश गुट के अकेली सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने का अनुमान लगाया गया है, तो किसी में भाजपा के बहुमत के करीब पहुंच जाने का. बसपा को ज्यादातर ओपिनियन पोल ने तीसरे नंबर पर रखा है, लेकिन वह इसे मीडिया का मनुवाद कह कर सीधे खारिज कर बेफिक्र है. उसका तर्क है कि 2007 में जब वह पूरे बहुमत से जीती, तो भी ये न्यूज चैनल उसे इसी तरह ‘अंडर इस्टीमेट’ कर रहे थे. चैनलों के अनुमानों के पार सर्वाधिक चर्चा इसकी है कि पिता से साइकिल रेस जीतने के अखिलेश उनके पारंपरिक एमवाइ समीकरण का भी विश्वास जीत पायेंगे या नहीं? अगर नहीं तो फायदा किसे मिलेगा? चैनलों की मानें तो भाजपा इसकी प्रबलतम दावेदार है, लेकिन बसपा कह रही है कि सपा से निराश अल्पसंख्यकों ने उसके दलितों से दोस्ती कर ली तो 39 या 40 प्रतिशत वोटों के साथ वह अजेय हो जायेगी. इस बीच उत्साह से लबरेज अखिलेश गुट अपने पक्ष में एक सर्वथा अनूठा तर्क ढूंढ लाया है.

कुछ खास बातें

1969 में कांग्रेस का विभाजन हुआ संगठन कांग्रेस और सत्ता कांग्रेस के रूप में हुआ. एक को इंडीकेट और दूसरे को सिंडीकेट कहा गया. सत्ता कांग्रेस मजबूती से उभरा.

1971 आम चुनाव में सर्वे कह रहे थे कि इंडीकेट नेता और पीएम इंदिरा गांधी फिर नहीं लौटेंगी. उन्हें विपक्षी नेता के लिए भी सीट नहीं मिलेगा. मगर वे अविभाजित कांग्रेस से अधिक मजबूत होकर उभरीं.

1967 के चुनाव में अविभाजित कांग्रेस को 282 सीटें मिली, जबकि 1971 में इंदिरा कांग्रेस को 351 सीटें मिलीं. 1979 में भी ऐसा ही हुआ, जब 1977 की करारी हार के बाद हो रहे मध्यावधि चुनाव से पहले कांग्रेस के 171 सांसद इंदिरा को छोड़ कर चले गये थे. तब भी उन्होंने उम्मीदों के विपरीत सत्ता में शानदार वापसी की.

1995 में लगभग सपा जैसे ही पारिवारिक बखेड़े में टूटी आंध प्रदेश की तेलगूदेशम पार्टी का चंद्रबाबू नायडू गुट विधानसभा चुनाव में एनटी रामाराव के नेतृत्ववाली मूल पार्टी से अधिक मजबूत होकर उभरा और बाद में वही असली तेदेपा बन कर उभरा.

1987 तमिलनाडु में राजचंद्रन की मौत के बाद एआइडीएमके का विभाजन हुआ तो जयललिता गुट भी मूल पार्टी से ज्यादा सीटें जीतने में सफल रहीं. तमिलनाडु में एमजीआर के बाद सबसे ताकतवर नेता बन कर उभरीं.