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सजा के साथ संवेदना भी अनिवार्य

अपराध रोकने के लिए सजा मिले की गारंटी का माहौल बेहद जरूरी आसनसोल : कोलकाता हाइ कोर्ट के न्यायाधीश असीम कुमार राय ने कहा कि महिला व शिशुओं की सुरक्षा व हितों से जुड़े कानूनों के क ड़ाई से पालन करने के साथ ही मानवीय संवेदना को भी केंद्र में रख कर पहल करनी होगी. […]

अपराध रोकने के लिए सजा मिले की गारंटी का माहौल बेहद जरूरी
आसनसोल : कोलकाता हाइ कोर्ट के न्यायाधीश असीम कुमार राय ने कहा कि महिला व शिशुओं की सुरक्षा व हितों से जुड़े कानूनों के क ड़ाई से पालन करने के साथ ही मानवीय संवेदना को भी केंद्र में रख कर पहल करनी होगी.
स्थानीय रवींद्र भवन में देवाशीष घटक फाउंडेंशन की ओर से ‘21 वीं शताब्दी में महिलाओं व बच्चों से संबंधित कानूनों में विकास (डेवलपमेंट इन द लॉ रिलेटेड टू वूमेन एंड चिल्ड्रेन इन द 21 सेन्चुरी)’ विषय पर आयोजित सेमिनार को संबोधित करते हुये उन्होंने कहा कि क ड़ाई से सजा देने से अपराध पर रोक नहीं लग पायेगी, इसके लिए जरूरी यह माहौल बनाना है कि अपराध करने पर सजा मिलने की गारंटी है. मंच पर राज्य सरकार के श्रम मंत्री मलय घटक भी उपस्थित थे.
न्यायाधीश श्री राय ने कहा कि वे सेमिनार के विषय से डायवर्सन में न जाकर 21वीं शताब्दी में महिलाओं व बच्चों के लिए जो कानून बने हैं, उनकी विशेषताओं से अवगत करायेंगे. कानून बनाना संसद का विशेषाधिकार है. उन्होंने कहा कि कोई भी कानून व्यापक जनाकांक्षा तथा लंबी लड़ाई के बाद बनता है. कानून को प्रभावी रूप से लागू करने की जरूरत होती है. लेकिन इसे पूर्ण रूप से लागू करने के लिए आम जनता को भी जागृत होना पड़ेगा.
यदि उसे लगता है कि कानून को और अधिक सुसंगत बनाने की जरूरत है तो आम जनता को इसे मजबूती से उठाना पड़ेगा, आंदोलन करना पड़ेगा. इसके बाद संसद से कानून बनेगा. उन्होंने कहा कि देश में महिलाओं की निर्णायक भूमिका रही है. शक्ति के लिए दुर्गा-काली, विद्या के लिए सरस्वती तथा समृद्धि के लिए लक्ष्मी की पूजा होती रही है. लेकिन मौजूदा दौर की सच्चाई यह है कि महिलाओं व बच्चों का शोषण व प्रताड़ना बढ़ रहा है. प्रताड़ना जन्म से पहले ही शुरू हो जाता है. गर्भाधान के बाद ही मेडिकल जांच करा उनका लिंग निर्धारण कराया जाता है. इसके बाद कन्या की भ्रूण हत्या कर दी जाती है.
राहत की बात है कि बंगाल में इस तरह की घटनाएं कम होती है, लेकिन नॉर्थ भारत के इलाकों में यह अधिक होता है. उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत में देवदासी प्रथा महिला विरोधी है. वहां किशोरियां देवताओं की सेवा के नाम पर समर्पित की जाती हैं, लेकिन मुख्य सेवा पुजारियों की होती है.
उन्होंने कहा कि वर्ष 2000 में घरेलू हिंसा रोकने के लिए कानून बना. इसके तहत परिवार की विधवा, विवाहिता, कुंवारी महिलाएं लाभान्वित हो सकती हैं. इसे वर्ष 2005 में संशोधित किया गया.
उन्होंने कहा कि इसके तहत घर में रहने का अधिकार दिया गया है. इन्हें परिजनों के स्तर से प्रताड़ित करने पर पुलिस के स्तर से सुरक्षा मिलेगी. जरूरत पड़ने पर उनके वैकल्पिक निवास की व्यवस्था करनी होगी. परिवार के कमाऊं सदस्य की आय का भी एक हिस्सा मिल सकता है. इसके बाद भी प्रताड़ना पर रोक नहीं लगने पर जमानतीय धारा के तहत प्राथमिकी होती है. इसमें एक वर्ष की सजा का प्रावधान है. उन्होंने कहा कि यौन प्रताड़ना से संबंधित कानूनों को काफी सख्त किया गया है. कम से कम तीन वर्ष की सजा का प्रावधान किया गया है. इसका दायरा काफी विस्तृत किया गया है.
किसी भी तरह से होनेवाली प्रताड़ना को शामिल किया गया है. एसिड प्रताड़ना की घटनाओं के तहत एसिड की खुली बिक्री पर रोक लगी है. सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता के लिए मुआवजे की भी व्यवस्था की है. इसकी राशि कम से कम दो लाख होनी चाहिए.
न्यायाधीश श्री राय ने हिन्दू उत्तराधिकारी कानून का जिक्र करते हुए कहा कि पहले पिता की मृत्यु के बाद बेटियों को उनकी संपत्ति में हिस्सा नहीं मिलता था. वसीयत होने पर ही संपत्ति मिलती थी.
लेकिन उसे संशोधित कर बेटियों का हक निर्धारित किया गया है. पहले पैतृक आवास में भाइयों की सहमति होने के बाद ही हिस्सा मिलता था, लेकिन इसे भी संशोधित कर बहन का अधिकार अनिवार्य कर दिया गया है. बहन के विवाहिता होने पर भी उसका अधिकार बना रहेगा.
महत्वपूर्ण बात यह है कि मुबंई हाइ कोर्ट की पूर्ण खंडपीठ ने अपने निर्देश में कहा है कि यह कानून तत्काल प्रभाव से प्रभावी न होकर वर्ष 1956 से प्रभावी होगा. बच्चों के कानूनों की चर्चा करते हुये उन्होंने कहा कि 21 वीं सदी में 14 वर्ष तक के किशोर व किशोरियों के लिए आठवीं कक्षा तक की शिक्षा को मौलिक अधिकार घोषित करना सबसे बड़ी उपलब्धि है. इसके लिए सरकारी स्कूलों में नि:शुल्क शिक्षा दी जायेगी.
नामांकन का समय बीतने के बाद भी नामांकन होगा तथा नामांकन से पहले कोई भी स्क्रिनिंग टेस्ट नहीं लिया जायेगा. इसके लिए बर्थ सर्टिफिकेट की अनिवार्यता भी समाप्त कर दी गयी है. प्राथमिक शिक्षा हासिल करने के बाद युवा पीढ़ी सार्थक दिशा में पहल करती है.
उन्होंने कहा कि नाबालिग बच्चों के अपराध करने पर उन्हें जेल में न रख कर तीन वर्षो तक सुधार गृह में रखा जाता है. ताकि इससे बाहर निकलने पर वे समाज की मुख्य धारा से जुड़ सके. उन्होंने कहा कि शादी के लिए लड़कें की उम्र 21 वर्ष तथा लड़की की उम्र 18 वर्ष अनिवार्य की गयी है. इसके नीचे विवाह करना दंडनीय अपराध है तथा शादी अवैध घोषित की गयी है. उन्होंने कहा कि बच्चों के शारीरिक व यौन शोषण से संबंधित कानूनों को भी सख्त किया गया है. कुछेक मामलों में कम से कम सात वर्ष की सजा का प्रावधान किया गया है.
सेमिनार को राज्य के श्रम मंत्री श्री घटक, आसनसोल कोर्ट के अतिरिक्त जिला न्यायाधीश टीके दास, वरीय अधिवक्ता शेखर कुंडू, वरीय अधिवक्ता पियूष कांति दास तथा अतिरिक्त लोक अभियोजक स्वराज चटर्जी आदि ने भी संबोधित किया. संचालन कोलकाता हाइ कोर्ट के अधिवक्ता के चक्रवर्त्ती ने किया.
Prabhat Khabar Digital Desk
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