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हावड़ा : मोमबत्ती के प्रकाश में मंजिल पाने की मशक्कत

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रोशनी कम होने पर मोमबत्ती के सहारे होती है पढ़ाई स्कूल में नहीं है बिजली, भवन भी है जर्जर एक क्लास रूम में चलती हैं तीन कक्षाएं हावड़ा : हावड़ा में विकास की गति बढ़ाने के लिए राज्य सचिवालय को हावड़ा में शिफ्ट किया गया. गंगा किनारे निर्मित गगनचुंबी सचिवालय नवान्न के नाम से प्रसिद्ध […]

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रोशनी कम होने पर मोमबत्ती के सहारे होती है पढ़ाई

स्कूल में नहीं है बिजली, भवन भी है जर्जर
एक क्लास रूम में चलती हैं
तीन कक्षाएं
हावड़ा : हावड़ा में विकास की गति बढ़ाने के लिए राज्य सचिवालय को हावड़ा में शिफ्ट किया गया. गंगा किनारे निर्मित गगनचुंबी सचिवालय नवान्न के नाम से प्रसिद्ध है आैर बेहद खूबसूरत है. हावड़ा की कई सभाओं में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से लेकर तमाम सत्ताधारी नेताओं को यह कहते सुना गया है कि कोलकाता से सटे हावड़ा शहर को सुंदर बनाने के लिए सचिवालय को हावड़ा में लाया गया.
नवान्न के पास से गुजरने वाली गाड़ियों में बैठे लोगों की नजर इस भवन पर जरूर पड़ती है लेकिन सचिवालय से कुछ दूरी पर ही एक एेसा विद्यालय हैं जहां छात्र-छात्राओं को बिना बिजली के पढ़ाई करनी पड़ती है.
ये बच्चे अंधकार में अपना भविष्य संवारने का प्रयास कर रहे हैं. स्कूल का नाम तो अाधुनिक विद्यालय है, लेकिन यहां आधुनिक तो छोड़िये बुनियादी सुविधाएं भी मयस्सर नहीं है. शिक्षा विभाग को स्कूल की ओर से कई बार चिट्ठी भेजी गयी है लेकिन अब तक कार्रवाई नहीं हुई. स्कूल भवन भी चिंता का विषय बना हुआ है. स्कूल से सटे (एक ही होल्डिंग नंबर) बिल्डिंग में नगर निगम की ओर से बोर्ड लगा दिया गया है, जिसमें लिखा है भवन जर्जर है. बावजूद इसके पढ़ाई जारी है. ऐसे में कभी भी यहां अप्रिय घटना हो सकती है.
1969 में हुई थी स्कूल की स्थापना
शिवपुर के आरएनआरसी घाट रोड स्थित आधुनिक विद्यालय की स्थापना 1969 में हुई थी. यहां प्री-प्राइमरी से पांचवी कक्षा तक की पढ़ाई होती है. बच्चों की संख्या 100 से अधिक है. स्कूल में कुल चार कमरे हैं. एक कमरे की छत पूरी तरह टूट गयी है. तीन कमरों में बच्चों को पढ़ाया जाता है.
एक ही क्लास रूम में प्री-प्राइमरी, कक्षा एक आैर कक्षा दो के छात्र-छात्राएं को बैठाया जाता है. एक ही ब्लैक बोर्ड पर तीनों क्लास के बच्चे पढ़ते हैं. बाकी दो क्लासरूम में तीसरी आैर चौथी कक्षा के बच्चे बैठते हैं. बेंच लगभग दम तोड़ चुकी है. एक बेंच में सीट से अधिक बच्चों को बैठाया जाता है.
2016 साल से नहीं है बिजली : वर्ष 2016 के आखिरी से स्कूल में बिजली नहीं है. स्कूल का अपना भवन नहीं है. किराये पर बिजली कनेक्शन लिया गया था, जिसे डिसनकेक्ट कर दिया. तब से बच्चे बिना बिजली के यहां पढ़ाई कर रहे हैं. सूरज की रोशनी जरूरत के मुताबिक अंदर नहीं आती है. बादल छाने पर क्लासरूम लगभग अंधेरा हो जाता है.
स्कूल में रोशनी की कमी पूरा करने के लिए मोमबत्ती का सहारा लेना पड़ता है. सामने आैर दूसरे बेंच पर बैठे बच्चे शायद ब्लैक बोर्ड पर लिखे अक्षर को शायद देख लें, लेकिन अंतिम बेंच पर बैठने वाले बच्चों को कम रोशनी के कारण बहुत साफ नहीं दिखाया देता है. शिक्षकों को भी मोमबत्ती का सहारा लेना पड़ता है. गरमी के दिन स्थिति आैर अधिक भयावह है. पंखा नहीं चलने से पिछले वर्ष की गरमी में कई बच्चे बीमार हुए. गरमी के कारण उल्टी आैर चक्कर हुआ. अभिभावकों को बुलाकर बच्चो‍ं को घर भेजा गया.
बिजली के बिना बहुत परेशानी होती है. पिछले साल भी गरमी में बिना पंखों के दिन काटने पड़े. हम बड़े तो बर्दाशत कर लेते हैं, लेकिन इन मासूमों की तकलीफ देखी नहीं जाती है. बिजली विभाग से अरजी लगायी गयी थी लेकिन तकनीकी कारणों के कारण विभाग ने मीटर लगाने से इनकार कर दिया. शिक्षा विभाग से गुहार है कि वह फौरन स्कूल में बिजली मुहैया करायें.
विमलेश सिंह, हेडमास्टर

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