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आफस्पा ‘एक्ट इस्ट’ नीति की राह में अड़चन : विशेषज्ञ

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कोलकाता : विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘एक्ट इस्ट’ नीति शुरू करने के साथ सरकार को पूर्वोत्तर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (आफस्पा) लगाये जाने की समीक्षा भी करनी चाहिए, क्योंकि यह क्षेत्र को दक्षिण-पूर्व के पड़ोसियों से जोड़ने की राह में बाधा हो सकती है. नयी दिल्ली में जामिया मिल्लिया […]

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कोलकाता : विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘एक्ट इस्ट’ नीति शुरू करने के साथ सरकार को पूर्वोत्तर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (आफस्पा) लगाये जाने की समीक्षा भी करनी चाहिए, क्योंकि यह क्षेत्र को दक्षिण-पूर्व के पड़ोसियों से जोड़ने की राह में बाधा हो सकती है.
नयी दिल्ली में जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में पूर्वोत्तर अध्ययन और नीति शोध केंद्र के निदेशक संजय हजारिका ने सवाल उठाया: अगर हमारी परिभाषा में आफस्पा के तहत पूर्वोत्तर एक ‘अशांत क्षेत्र’ है तब आप हर किसी से ‘एक्ट इस्ट’ नीति के तहत पूर्व की ओर देखने को कैसे कह सकते हैं ?
आप संपर्क में कैसे सुधार करेंगे? एशिया में संपर्क बढाने के लिए हाल में कोलकाता में एक सम्मेलन में उन्होंने कहा कि साल की शुरुआत में केंद्र सरकार ने अरुणाचल प्रदेश और मेघालय के साथ असम की सीमा में 20 किलोमीटर क्षेत्र के साथ पूरे असम राज्य में आफस्पा एक साल के लिए और बढा दी. मणिपुर में नागरिक अधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला चानू क्षेत्र से आफस्पा हटाए जाने के लिए पिछले 14 साल से अनशन कर रही हैं.
न्यूजीलैंड के ओटागो विश्वविद्यालय में दक्षिण एशिया अध्ययनकर्ता डगलस हिल ने कहा कि चीन जैसी ताकत को निशाना बनाने की बजाय भारत की ‘एक्ट इस्ट’ नीति का ध्यान पूर्वोत्तर में रह रहे लोगों की जरुरतों को पूरा करने पर होना चाहिए. उन्होंने कहा : संपर्क, सुरक्षा, आतंकवाद से मुकाबला, कारोबार और पर्यावरण के क्षेत्र में कई मुद्दे हैं जो पूर्वी एशियाई देश को प्रभावित कर रहे हैं. पूर्वी एशियाई पड़ोसियों को ज्यादा तवज्जो देते हुए मोदी सरकार ने भारत की ‘लुक इस्ट’ नीति को और ज्यादा असरदार बनाते हुए ‘एक्ट इस्ट’ नीति का नाम दिया.
पूर्वी एशियाई देशों के बीच संपर्क बढाने के लिए 32,00 किलोमीटर लंबे भारत-म्यांमार -थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग बनाने की योजना है. यह मणिपुर में मोरेह से वाया म्यांमार के मांडले होते हुए थाईलैंड के माए सोट तक का राजमार्ग होगा. ऑबर्न विश्वविद्यालय के केली डी एले ने क्षेत्र में समस्याओं को सुलझाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति पर जोर दिया.

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