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भाजपा की रथयात्रा बंगाल में नहीं चलेगी : माकपा

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कोलकाता. पूरे देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भाजपा की ओर से जैसे विभाजन का अभियान चलाया जा रहा है. धर्मनिरपेक्षता, तर्कवाद विचारधारा पर हमले हो रहे हैं. देश भर में असहिष्णुता का माहौल तैयार हो रहा है. इसी का परिणाम है कि देश के विभिन्न हिस्सों में सांप्रदायिक व हिंसा की कई घटनाएं […]

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कोलकाता. पूरे देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भाजपा की ओर से जैसे विभाजन का अभियान चलाया जा रहा है. धर्मनिरपेक्षता, तर्कवाद विचारधारा पर हमले हो रहे हैं. देश भर में असहिष्णुता का माहौल तैयार हो रहा है. इसी का परिणाम है कि देश के विभिन्न हिस्सों में सांप्रदायिक व हिंसा की कई घटनाएं घटीं. इसके लिए भाजपा नीत केंद्र सरकार की नीति जिम्मेवार है. यह आरोप माकपा की ओर से लगाये गये हैं.

अगले वर्ष राज्य में विधानसभा होने वाला है. कथित तौर पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह अब बंगाल में रथयात्रा निकालने की कार्यसूची के बारे में सोच रहे हैं. सूत्रों के अनुसार इस मसले को लेकर माकपा राज्य कमेटी की बैठक में भी चर्चा हुई. माकपा राज्य कमेटी द्वारा जारी बयान के अनुसार राज्य में भाजपा की रथयात्रा नहीं चल पायेगी. बंगाल के लोग सांप्रदायिकता की भावना बढ़ाने वाली शक्तियों के कभी पक्षधर नहीं रहे हैं. यदि भविष्य में राज्य में लोगों के बीच मतभेद पैदा करने की कोशिश की जायेगी तो पूरी शक्ति के साथ वामपंथी इसका विरोध करेंगे. राज्य में सांप्रदायिक सौहार्द की भावना को नष्ट कतई नहीं होने दिया जायेगा.

वामपंथियों को अब बीपीएमओ पर भरोसा
कोलकाता. अगले वर्ष राज्य का विधानसभा चुनाव होने वाला है. अपनी खोयी हुई ताकत वापस पाने व मौजूदा सत्तारूढ़ दल तृणमूल कांग्रेस को पछाड़ने के लिए अब वामपंथियों को बंगाल प्लेटफार्म ऑफ मास आर्गेनाइजेशन (बीपीएमओ) से काफी उम्मीदें हैं. यही वजह है कि सौ से भी ज्यादा संगठनों को मिला कर गठित बीपीएमओ के बैनर तले जनहित से जुड़े कई मुद्दों को लेकर आंदोलन की कार्यसूची भी तैयार की गयी है.

विगत गुरुवार को माकपा राज्य कमेटी की बैठक में भी उक्त कार्यसूची पर चर्चा की गयी थी. सूत्रों के अनुसार नवंबर महीने के तीसरे सप्ताह से राज्य में बूथ स्तर पर तृणमूल सरकार की जनविरोधी नीतियों के आरोप में आंदोलन किये जायेंगे. साथ ही जनसंपर्क बढ़ाने का अभियान चलाया जायेगा. आंदोलन के दौरान लोगों को अपना वोट खुद देने से संबंधित स्लोगन भी तय किये जाने की बात सामने आयी है. अब देखना है कि यह रणनीति वामपंथियों के लिए कितनी फलीफूत होती है.

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