हंगामा बरपा मगर हिंदी फिर बेचारी

आजाद भारत के सामने भाषा को लेकर दो अहम सवाल थे- देश की संपर्क भाषा क्या हो, और राष्ट्रीय स्तर पर सरकारी कामकाज किस भाषा में हो. इस बात पर लगभग एकराय थी कि इन दोनों कामों के लिए सबसे उपयुक्त हिंदी ही रहेगी. गांधीजी भी हिंदी (जिसे वह हिंदी-उर्दू के मिलेजुले रूप, हिंदुस्तानी के […]

By Prabhat Khabar Digital Desk | June 28, 2014 9:10 AM

आजाद भारत के सामने भाषा को लेकर दो अहम सवाल थे- देश की संपर्क भाषा क्या हो, और राष्ट्रीय स्तर पर सरकारी कामकाज किस भाषा में हो. इस बात पर लगभग एकराय थी कि इन दोनों कामों के लिए सबसे उपयुक्त हिंदी ही रहेगी. गांधीजी भी हिंदी (जिसे वह हिंदी-उर्दू के मिलेजुले रूप, हिंदुस्तानी के रूप में देखना चाहते थे) की बस इतनी ही भूमिका चाहते थे.

वह जानते थे कि हिंदी को इससे ज्यादा तवज्जो अन्य भारतीय भाषाओं को सशंकित करेगी. लेकिन, कई लोगों के लिए हिंदी की भूमिका सिर्फ इतनी ही नहीं थी. उन्हें तो एक ‘राष्ट्रभाषा’ चाहिए थी जो उन्हें राष्ट्रीय गौरव का एहसास करा सके. इन दो मत-धाराओं के बीच हिंदी ‘राजभाषा’ बनी, लेकिन ‘हिंदी, हिंदू, हिंदुस्थान’ वाले इसे राष्ट्रभाषा ही कहना पसंद करते हैं. लेकिन, आज हकीकत यह है कि आप हिंदी को राजभाषा कह कर खुश हों या राष्ट्रभाषा, यह झुनझुने से ज्यादा नहीं है. क्योंकि हिंदी के राजभाषा बनने के साथ ही यह पेच जुड़ गया कि जब तक हिंदी में काम होने लायक स्थितियां नहीं बन जातीं, अंगरेजी में भी काम होता रहेगा. अजीब बात यह है कि आज भी हिंदी में काम होने लायक स्थिति नहीं बन पायी है और अंगरेजी की हनक कायम है. हाल ही में, केंद्र सरकार की ओर से सोशल मीडिया में हिंदी के इस्तेमाल को लेकर निर्देश दिये गये, तो दक्षिण में हिंदी के विरोध की पुरानी यादें ताजा हो गयीं. ऐसे में एक बड़ा सवाल है कि क्यों अंगरेजी मंजूर है, पर हिंदी नहीं? इसी का जवाब तलाशने का छोटा-सा प्रयास है यह विशेष पन्ना.

हिं दीवादी उल्लसित हैं कि आखिरकार रायसीना की पहाड़ियों पर हिंदी की पताका फहरा दी गयी है. प्रतीकों की राजनीति के दौर में लंबे समय से प्रताड़ित होने की कुंठा से ग्रस्त, जख्मी हिंदी-हृदय के लिए यह समाचार भी मरहम की तरह था कि अधुनातन तकनीक का इस्तेमाल करनेवाली राजकीय सत्ता अब पहले हिंदी में देश को अपना संदेश दिया करेगी.

निर्देश था कि अंगरेजी और हिंदी, दोनों भाषाओं में केंद्र सरकार सोशल मीडिया पर बातचीत करेगी, लेकिन प्राथमिकता हिंदी को ही दी जायेगी. लेकिन यह खुशी चंद लमहों की थी. तमिलनाडु के राजनेताओं ने जैसे ही इस पर भौंह चढ़ाई, केंद्र ने सफाई देना शुरू कर दिया. कहा गया कि हिंदी को गैर- हिंदीभाषी क्षेत्रों पर थोपने का सरकार का कोई इरादा नहीं. फिर इस पाप से अपना पीछा छुड़ाने के लिए कहा गया कि यह तो पिछली सरकार का परिपत्र था जिसे वह लागू भर कर रही है. पहले चुनाव हार चुके करुणानिधि और फिर इस सरकार के सहयोगी दलों ने चेतावनी दी कि इस निर्देश का आशय यह है कि उत्तर भारत के हिंदीवाले अपना भाषाई साम्राज्य गैर-हिंदी प्रदेशों में फैलाना चाहते हैं. तमिलनाडु की मुख्यमंत्री को यह कहने के लिए धमकी देने की जरूरत नहीं पड़ी कि यह सुनिश्चित किया जाये कि अंगरेजी में कामकाज जारी रहे. केंद्र सरकार कुछ और दलीलें देती रही. पहले तो उसके गृह राज्य मंत्री ने तर्क देने की कोशिश की कि हिंदी का प्रयोग अखिल भारतीय स्तर पर हो, इसके लिए प्रेरणा देना और जरूरी उपाय करना सरकार का कर्तव्य है. हिंदी अखबारों में इस साहसी और जनवादी कदम की प्रशंसा की जाने लगी. लेकिन जैसे ही सुदूर दक्षिण के द्रविड़ प्रदेश से आपत्ति के स्वर उठे, सरकार की हिंदी बदल गयी. बड़े गृह मंत्री ने साफ किया कि यह निर्देश सिर्फ हिंदीभाषी प्रदेशों के लिए है. फिर यह कहा गया कि सरकार भारत की सभी भाषाओं की समान उन्नति चाहती है. कुल मिला कर बात वहीं रह गई जहां बरसों से अटकी पड़ी है. हिंदीवादियों को फिर पराजय का मुंह देखना पड़ा.

ऐसा क्यों हुआ? क्या हिंदी बेचारी एक भारी अखिल भारतीय षड्यंत्र की शिकार है? अगर सरकार अभी पीछे हट गयी और उसके समर्थकों ने भी क्षोभ की कोई आंदोलनात्मक अभिव्यक्ति नहीं की तो क्या इस कारण कि वे यह देख रहे हैं कि अभी दक्षिण में भारतीय जनता पार्टी के पांव जमे नहीं हैं और यह कदम उसके प्रति वहां विरक्ति पैदा कर सकता है! क्या वे तब तक प्रतीक्षा करना चाहते हैं जब तक तमिलनाडु में उनके दल को बहुमत न मिल जाए! क्या केंद्र सरकार के हिंदी में काम करने के इरादे के प्रचार का मकसद भी प्रतीकात्मक ही था? क्या यह उत्तर भारत के उनके मतदाताओं के लिए था कि देखिए हम तो हिंदी चाहते हैं, लेकिन उसके लिए हमें अखिल भारतीय वर्चस्व भी चाहिए. तब तक इंतजार के अलावा कोई चारा नहीं!

भाषा को लेकर स्वत:स्फूर्त आवेगों का जो जो हिंसक प्रदर्शन पहले होता रहा था, अब उसका समय बीत चुका लगता है. अनेक स्कूलों में ग्यारहवीं के बाद से हिंदी की पढ़ाई की कोई व्यवस्था नहीं है. हिंदी प्रदेशों में भी हिंदी का वफादार हो सकने के लिए अंगरेजी विरोध की जो शर्त थी वह भुला दी गयी है. अंगरेजी हटाओ आंदोलन की यादें धुंधली पड़ गयी हैं. हिंदी को उसका प्राप्य न देने के लिए इंग्लैंड में पढ़े, मोतीलाल नेहरू के पुत्र जवाहरलाल को उत्तरदायी ठहराया जाता रहा है. समाजवादी लोगों ने नेहरू-घृणा के प्रचार में इसे सामान्य बोध का हिस्सा बना दिया है. निराला-नेहरू संवाद किंवदंती बन चुका है.
नेहरू को इसके लिए जिम्मेदार ठहराना कि हिंदी आजादी के पंद्रह साल बाद भी भारत की एकमात्र राजकीय भाषा न बन पायी, कमजोर बुद्धि का प्रमाण है. जैसे भारत-पाकिस्तान बंटवारे के लिए नेहरू की सत्ता लिप्सा को जिम्मेदार ठहरा देने से उस निर्णय की जटिलता पर सोचने के सरदर्द से मुक्ति मिल जाती है, वैसे ही यहां भी नेहरू के रूप में एक खलनायक मिल जाने से काम आसान हो जाता है. हिंदी, जिस रूप में इस टिप्पणी में इस्तेमाल की जा रही है, उन इलाकों के बाशिंदों के लिए भी सीख कर अर्जित करने की भाषा है, जिन्हें आलस्यवश हिंदी प्रदेश कहा जाता रहा है. खड़ी बोली हिंदी का इतिहास कोई डेढ़ सौ साल का ही है. वह भोजपुरी, मैथिली, मगही, अंगिका, वज्जिका, ब्रज, अवधी, राजस्थानी, मेवाती, बुंदेली आदि भाषाओंवाले प्रदेश में पनपी और पल्लवित हुई. यह हिंदी इनके लिए नई चीज़ थे और उसके साथ रिश्ता सहज नहीं था. मुङो भी याद है कि सीवान, जो कि भोजपुरी प्रधान इलाका है, के अपने बचपन में जब अपने दोस्तों से खड़ी बोली में बात करता था तो वे मेरी भर्त्सना यह कह कर करते थे, ‘‘ढेर अंगरेजी मत बूकौ.’’ खड़ी बोली हिंदी हाल-हाल तक इन प्रदेशों के लिए अंगरेजी ही रही है. खड़ी बोली हिंदी ने इन सारी भाषाओं के सरमाये को अपनी विरासत घोषित कर दिया. विद्यापति, कबीर, सूरदास, तुलसीदास, जायसी, रहीम, बिहारी आदि हिंदी के कवि मान लिये गये. ग्रियर्सन से लेकर आचार्य रामचंद्र शुक्ल तक हिंदी की रचना का काम हो चुका था. ये सारी भाषाएं हिंदी की बोलियां घोषित कर दी गयी थीं. उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष में नयी राष्ट्रीयता के गठन में उसके उपयोग को देखते हुए सर्वत्र उसका स्वागत हुआ. यहां तक कि दक्षिण भारत में वह ललक के साथ अपनायी गयी. एक मूल गुजराती भाषी मोहन दास करमचंद गांधी द्वारा उसे अपना लिए जाने के बाद उसे अखिल भारतीय स्वीकृति मिलने में बहुत कठिनाई नहीं हुयी. प्रख्यात रंगकर्मी ब व कारंथ ने, जो मूलत: कन्नडभाषी थे, अपनी आत्मकथा में कर्नाटक और अन्य दक्षिण के प्रदेशों में आजादी के पहले हिंदी की लोकप्रियता का विस्तार से वर्णन किया है. वे स्वयं गुब्बी थियेटर कंपनी में रहते हुए हिंदी सीख रहे थे, फिर स्कूल में हिंदी के अध्यापक बने और बाद में कन्नड़ भाषियों के आर्थिक सहयोग से हिंदी की उच्चतर शिक्षा के लिए बनारस आये. वे कोई अपवाद न थे. एक बार उन्होंने हमें हंसी-हंसी में बताया था कि उस वक्त हिंदी हमारे यहां इतनी लोकप्रिय थी कि लड़कियां हिंदी प्रचारकों के साथ भाग जाया करती थीं. अगर हिंदी रंगमंच या फिल्म के इतिहास को देखें तो मालूम होता है कि गैर हिंदीभाषियों ने इन्हें कितना समृद्ध किया है. हिंदी का पालना भी कोलकाता, बंबई या हैदराबाद जैसी जगहें ही रही हैं.
हिंदी से विराग या उससे ‘द्वेष’ फिर क्यों हुआ? इसका कारण भारत के राष्ट्र राय बनने की जटिल कथा में छिपा है. हिंदी जब राज्य की पहली भाषा बनने का दावा करने लगी तो अन्य भाषाओं को दोयम दर्जे की स्थिति का भय हुआ. भारत नाम की परियोजना में शामिल होने की स्वीकृति हर प्रकार की समानता की शर्त पर टिकी थी. भारत की हर भाषा को समान दर्जा प्राप्त है, यह आश्वासन संविधान द्वारा दिया गया. इसीलिए संविधान राष्ट्र भाषा की अवधारणा से ही इनकार करता है. संविधान में भाषाओं वाले कहंद का शीर्ष है: भाषाएं , न कि राष्ट्र भाषा.
ढीले-ढाले तरीके से या दिमागी आलस की वजह से हम अक्सर हिंदी को राष्ट्र भाषा की पदवी दे बैठते हैं. संविधान की आठवीं अनुसूची के इतिहास को भी देखने से ही पता चल जाता है कि यह एक तरह से खुली सूची है. अब तक इसमें 22 भाषाएं शामिल हो चुकी हैं. कल यह सूची पचास तक जा सकती है. भाषा का दर्जा प्राप्त करने के लिए किसी ‘बोली’ को अपनी आतंरिक संरचना में कोई तब्दीली नहीं करनी होती है. भाषा वैज्ञानिकों में बीच बहुप्रचलित कहावत है, कि हर वह बोली जो थल सेना, जल सेना और वायु सेना से लैस है, भाषा है. यानी भाषा का रिश्ता राजनीतिक ताकत से है. आज बोडो आठवीं अनुसूची का हिसा बनी है, कल मुंडारी या राठवी भी बन सकती है. अगर उसे व्यवहार करने वाला समुदाय राजनीति के लिहाज से मोलतोल की हालत में आ सके.
भारत में पंद्रह सौ से ऊपर भाषाएं हैं. इन्हें आठवीं अनुसूची में जाने से रोकने के लिए कोई कारण नहीं है. न तो संख्या, न भाषा में मात्र लिखित सामग्री का होना, कोई शर्त नहीं. सिर्फ राजनीतिक शक्ति महत्वपूर्ण है. अगर कोई भाषा अभी आठवीं अनुसूची में नहीं है तो इसका एकमात्र कारण उसकी राजनीतिक शक्ति की कमी में देखा जाना चाहिए. हिंदी के भाषा बनने की प्रक्रि या में बाधा के लिए बार-बार मैकॉले को याद किया जाता रहा है.
फरवरी,1835 में थॉमस बैबिंगटन मैकॉले ने विलियम बेनटिक के कहने पर, जो तब तक ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रभुत्व को लगभग स्वीकार कर चुके भारत के गवर्नर जनरल थे, अपनी रिपोर्ट लिखी. इस रिपोर्ट ने भारत की शिक्षा की दिशा इस तरह तय कर दी कि अब तक उसके विरुद्ध सभी सांस्कृतिक, शिक्षाशास्त्रीय और भाषावैज्ञानिक तर्कों के बावजूद हम दूसरा रुख नहीं कर पाये हैं. यूरोपीय सभ्यता की श्रेष्ठता के सिद्धांत की खुद यूरोप में बौद्धिक रूप से प्रतिष्ठा नहीं रह गयी है. मैकॉले इस श्रेष्ठता में विश्वास रखने वाले अधिकारी थे. भारत आने के बाद यहां के राजे-रजवाडों का दीनतापूर्ण व्यवहार देखकर, जिसका जिक्र वे अपने पत्रचार में करते हैं, उनका यह यकीन और पक्का हो गया. यहां के इसाईयों में जाति आधारित भेदभाव देख कर भी वे इस नतीजे पर पहुंचे कि यहां की सामाजिक संरचना में ही कोई बुनियादी खोट है और उसे दूर करना अंगरेज शासकों का फर्ज है. हालांकि इसे लेकर बहस रही है कि क्या मैकॉले के मिनट ने ही अंग्रेज़ी के पक्ष में पासा पलट दिया या उसके पहले ही बेंटिंक यह फैसला कर चुके थे और मैकॉले ने मात्र उन्हें एक तरह का बौद्धिक सहारा दिया क्योंकि खुद बेंटिक, जैसा इतिहासकार कहते हैं, कोई बहुत पढ़े-लिखे न थे जबकि मैकॉले बहुभाषाविद, शिक्षा और अन्य मामलों के अधिकारी विद्वान के रूप में पहले ही मशहूर थे. मैकॉले का हस्तक्षेप

महत्वपूर्ण जरूर था. भारत में शिक्षा को लेकर राजकीय

रु ख 1813 के ब्रिटिश कानून से तय होता था जिसने पूर्वी ( ओरिएंटल ) शिक्षा को राजकीय समर्थन का प्रावधान किया था. बाद में शिक्षा नीति के क्रि यान्वयन के लिए बनायी गयी समिति में इसे लेकर मतभेद हो गया कि राजकीय संसाधन अंग्रेज़ी शिक्षा पर खर्च किया जाये या पूर्वी शिक्षा पर. पूर्वी शिक्षा का अर्थ यहां संस्कृत और अरबी में दी जाने वाली शिक्षा से है. समिति में दोनों मतों के पक्ष में बराबर का बंटवारा होने से गतिरोध पैदा हो गया था जिसे तोड़ने के लिए गवर्नर जनरल ने मैकॉले की मदद मागी.
मेकॉले का तर्क साम्राज्य की सांस्कृतिक श्रेष्ठता और उसके चलते उसके बड़े दायित्व-बोध के सिद्धांत पर टिका था. साम्राज्य का काम हीनतर अवस्था में पड़े पूर्वी समाज को प्रकाश दिखाना था और इसके लिए अंगरेजी शिक्षा के अलावा और उपाय नहीं था.
मैकॉले के मुताबिक अंगरेजों का फर्ज था उस ज्ञान-विज्ञान से भारतीयों को परिचित कराना जिसके आधार पर वह उनसे उन्नत होने का दावा करते थे. यह काम इतना पवित्र था कि अगर इस शिक्षा के चलते एक दिन भारतीय उन्हें ही चुनौती देने लगे तो वह जोखिम भी उठाया जा सकता था. मैकॉले में एक इतिहास-बोध भी है यह इससे पता चलता है कि वह याद दिलाते हैं कि अंग्रेज़ी हमेशा से इस पद पर नहीं थी और इसके लिए उसे संघर्ष करना पड़ा था. वे भारतीयों के एक परायीभाषा न सीख पाने के तर्क को यह कह कर खारिज करते हैं कि उनके लिए यह अंग्रेजों के लैटिन सीखने से अधिक मुश्किल नहीं होना चाहिए.
संस्कृत और अरबी की शिक्षा पर सरकारी खर्च किसी तरह जायज़ नहीं ठहरता क्योंकि समाज के बहुलांश के लिए ये परायी थीं.

ध्यान रहे कि मैकॉले से बारह साल पहले राजा राममोहन रॉय जैसे सुधारक अंगरेज़ हुक्मरान से यह प्रार्थना कर चुके थे कि भारत में अंग्रेज़ी की शिक्षा का प्रावधान किया जाये और उनके तर्क मैकॉले से बहुत अलग न थे. संस्कृत पर पैसा खर्च करना उनकी निगाह में हानिकर ही था. हिंदी अभी उस रूप में पैदा न हुई थी जिसमें हम उसे पहचानते हैं. यह कहना बहुत गलत न होगा कि मैकॉले के ध्यान में द्वंद्व संस्कृत-अरबी और अंग्रेज़ी के बीच था. संस्कृत और अरबी या फारसी के अलावा स्थानीय भारतीय भाषाओं की ओर से वकालत के प्रमाण इस बहस में नहीं मिलते हैं.

हिंदी का जन्म मैकॉले के गुजर जाने के काफी बाद हुआ. भारतीय स्वाधीनता-आन्दोलन में हिंदी का आन्दोलन राष्ट्रीय भावनाओं के प्रचार के साथ जुड़ा था. इस पर अभी काम होना शेष है कि साहित्य के अलावा अन्य विद्याओं में सक्रि य लोग भाषा के बारे में क्या सोच रहे थे. सवाल यह है कि हिंदी क्यों मैकॉले-बाधा को दूर नहीं कर पायी है. हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं और राजकीय संसाधनों के बीच के रिश्ते की समझ के लिए अलग अवकाश की आवश्यकता होगी. स्वयं वैज्ञानिक और समाजवैज्ञानिक निकायों या संस्थानों में कोई भाषा चेतना रही भी है या नहीं, इसे भी अलग से समझना पड़ेगा. यह इसलिए भी ज़रूरी है कि जब ये राज्य से साधनों की मांग करते हैं तो भाषा और ज्ञान को लेकर कुछ कहते भी हैं या नहीं, हमें पता नहीं. हिंदी को लेकर जो भी मांग है वह भावना की दुहायी देकर की जाती है.
हिंदी और भावना के संबंध के पीछे गलतफहमी यह रही है कि इस देश की बहुलांश आबादी की मातृभाषा हिंदी है. खड़ी बोली हिंदी उन लोगों के लिए अभी भी सीखी जाने वाली और कामकाजी भाषा है जो घरों और गांव या मोहल्लों में ब्रज, अवधी, भोजपुरी, मैथिली, बुंदेली, राजस्थानी, हो, मुंडारी, संथाली आदि बोलते हैं. हिंदीवादी मन ही मन इन सारी भाषाओं की मृत्यु की कामना करते आये हैं जिससे हिंदी का मार्ग निष्कंटक हो जाये लेकिन वह अब तक नहीं हो पाया है. इस परिस्थिति ने हिंदी के लिए राजकीय संसाधनों पर एकाधिकार के प्रश्न को, कम से कम उन प्रदेशों में जिन्हें हिंदी प्रदेश कहते हैं, जटिल बना दिया है. एक लंबे समय तक शिक्षा और ज्ञान की निगाहों से ओझल आदिवासी भाषाएं भी राजकीय साधनों पर अपना दावा पेश करने लगी हैं.
पिछले कुछ बरसों से यह अहसास गहरा हुआ है कि हिंदी की दावेदारी तब तक मजबूत नहीं होगी जब तक उसमें ज्ञान-विज्ञान का सृजन नहीं होगा. हिंदी का यह दावा कि वह करोड़ों लोगों द्वारा बोली और समझी जाती है, व्यर्थ है क्योंकि उसमें ज्ञान का कोई महत्वपूर्ण काम नहीं होता. अगर गूगल के सहारे खोज करें तो विज्ञान की पत्रिका के नाम पर ‘विज्ञान प्रगति’ के अलावा कुछ भी नहीं हाथ आता. ‘विज्ञान प्रगति’ विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के मकसद से निकाली जाती है. उसी तरह कृषिविज्ञान जैसे विषय में भी एकाध पत्रिका को छोड़कर हिंदी में कुछ भी नहीं. समाजशास्त्र, राजनीति शास्त्र, नृतत्वशास्त्र, मनोविज्ञान हो या दर्शन, हिंदी में स्तरीय शोध पत्रिकाएं या जर्नल नगण्य हैं. यहां तक कि भाषा विज्ञान के क्षेत्र में भी हिंदी में उल्लेखनीय काम नहीं हुआ है. इस स्थिति को क्या हम इन क्षेत्रों में सक्रि य विद्वानों के इरादों और फैसलों का नतीजा मानें या किसी और तरीके से इसे समझने का
प्रयास करें?
भौतिकशास्त्र की भाषा अलग है और रसायनशास्त्र की अलग, भले ही दोनों अंग्रेज़ी या फ्रेंच में लिखे जा रहे हों. भारत के एक समाजशास्त्री की इच्छा चीन, श्रीलंका, ब्राजील, अमरीका या फ्रांस के समाजशास्त्र के संसार में पहचाने जाने की हो तो इसमें गलत क्या है? फिर उपाय क्या है? क्या वह ऐसी भाषा में लिखे जो उसके देश या समाज में तो समझी जाती है लेकिन उसकी विद्या अथवा अनुशासन के व्यापक संसार में नहीं समझी जातीं? ऐसा करके वह गुमनामी का वरण कर रहा होगा जिसमें शहादत की बहादुरी तो है लेकिन उसके जीवन भर के ज्ञानाभ्यास के अनपहचाने रह जाने से पैदा हुआ निर्थकता बोध भी है. यह दुविधा सिर्फ भारत जैसे देश में काम करने वाले बौद्धिकों की नहीं है.
हिंदी का मुकाबला इस प्रसंग में भारतीय भाषाओं से नहीं अंगरेजी से है. लेकिन अंगरेजी ने तो ज्ञान और अकादमिक क्षेत्र में जर्मन, फ्रेंच, स्वीडिश आदि भाषाओं को भी उनकी पूर्व स्थिति से अपदस्थ कर दिया है. कोइ सवा सौ साल पहले मृत्यु के ठीक पहले चांसलर ओटो वोन बिस्मार्क से एक पत्रकार ने इंटरव्यू के दौरान पूछा कि वे किसे अपने समय की सबसे निर्णायक घटना कहेंगे. बिस्मार्क ने जवाब दिया, ‘यह बात कि उत्तरी अमरीका अंगरेजी बोलता है.’ यूनिविर्सटी ऑफ मिशिगन के प्रोफेसर जॉन एम स्वेल्स ने एक निबंध में बिस्मार्क के इस वक्तव्य को भविष्य कथन बताते हुए लिखा है जिस वक्त वह यह कह रहे थे उस समय जर्मन भाषी विज्ञान और मेधा, जर्मन टेक्नोलॉजी और उद्योग और जर्मन भाषी विश्वविद्यालय बाकी दुनिया के मुकाबले बहुत-बहुत आगे थे. जर्मन के ऊपर अंगरेजी की जीत के कारण दो विश्व युद्धों में जर्मनी की भूमिका और हिटलर के शासन काल में श्रेष्ठ जर्मन वैज्ञानिकों और बौद्धिकों के अमरीका जैसे अंगरेजी भाषी देश की ओर पलायन में खोजे जा सकते हैं.
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ही ऐसी देश था जिसकी अर्थव्यवस्था और भौतिक ढांचा लगभग युद्ध से अप्रभावित रहा था.
अंगरेजी ने लेकिन सिर्फ जर्मन को ही नहीं धीरे-धीरे ज्ञान के इलाके से अन्य भाषाओं को किनारे कर दिया है. स्वेल्स ने मेक्सिको के ‘जर्नल ऑव एनाटोमी एंड एम्ब्रायोलोजी’ की, जो अभी सिर्फ अंगरेजी में प्रकाशित होता है, यात्र कथा बतायी है. 1876 में यह केवल स्पेनिश में छपता था, 1974 से यह स्पेनिश और अंगरेजी में छपने लगा और 1983 आते-आते यह सिर्फ अंगरेजी में प्रकाशित होने लगा. भौतिक शास्त्र हो या अर्थशास्त्र, मौलिक शोध कार्य को सिर्फ और सिर्फ अंगरेजी में ही स्वीकार करने की नीति अब प्राय: हर जगह आम होती जा रही है. अंग्रेज़ी के प्रभुत्व का कारण लेकिन उस भाषा के किसी ऐसे आतंरिक गुण में नहीं है जो उसे सहज ही ज्ञान की भाषा बना देती है. अंगरेजी के प्रसार को समझने के लिए एक पाकिस्तानी व्याख्याकार का यह कथन पर्याप्त है, ‘पूरी दुनिया में अंगरेजी पढ़ाना अरबों डॉलर का धंधा बन गया है जिसकी तुलना सिर्फ नशीले पदार्थों के व्यापार के प्रसार से की जा सकती है.’
इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि अंगरेजी का यह मारक प्रसार विश्व के सांस्कृतिक स्वास्थ्य के लिए और खुद अंगरेजी के लिए भी शुभ नहीं है. जैव-विविधता की तरह भाषाई विविधता की अवधारणा अब लोकप्रिय हो चुकी है. लेकिन उसके साथ ही ध्यान दिलाया गया है कि किसी एक भाषा के स्वास्थ्य के लिए स्वयं उसके भीतर प्रयुक्तिगत वैविध्य अनिवार्य है. यानी यह संभव होना चाहिए कि हिंदी या उर्दू या बांग्ला में एक रसायनशास्त्री रसायनशास्त्री की तरह बात करे, भूगर्भशास्त्री अपने अनुशासन की भाषा में बात कर सके. अंगरेजी को सिर्फ शेक्सपीयर ने नहीं चाल्र्स डार्विन ने भी बनाया है.
हिंदी और ज्ञान-विज्ञान की बात आते ही सबसे ज्यादा राजकीय चिंता अनुवाद को लेकर व्यक्त की जाती है. अनुवाद एक तरीका है किसी भी भाषा को समृद्ध करने का लेकिन वह उस भाषा में अलग-अलग विषयों पर मौलिक लेखन की जगह नहीं ले सकता. किसी भी भाषा को अकादमिक तब तक नहीं माना जा सकता जब तक विषय विशेष को लेकर उसमें ताज़ा सूचनाएं नहीं मिलतीं. ज्ञान की सूचनाएं, जो अनुवाद के जरिये उस तक पहुंचती हैं, स्वयं ज्ञान निर्माताओं के लिए नयी नहीं रह जातीं, उस भाषा के सामान्य पाठकों के लिए भले ही हों. ज्ञानात्मक सूचना का नयापन बड़ी शर्त है ज्ञान की दुनिया में किसी भी भाषा की प्रतिष्ठा के लिए. हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद के लिए तो साधन मुहैया कराया जाता है, हालांकि वह भी अत्यंत ही कृपाभाव से. लेकिन भाषाओं में मौलिक शोध या लेखन के लिए राजकीय योजनाएं अलग से कोई प्रावधान नहीं करतीं. विज्ञान को तो छोड़ ही दें, इतिहास या राजनीतिशास्त्र में भी मौलिक शोध या लेखन के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, न इतिहास परिषद और न समाजविज्ञान शोध परिषद में से किसी ने कभी इस विषय पर गंभीर चिंतन किया हो, इसका प्रमाण नहीं है. मैकॉले को ही क्या इसका दोषी ठहराया जाये कि भारतीय राज्य ने और उसके बौद्धिकों ने कभी उत्तरमैकॉले भाषा-स्थिति पर विचार नहीं किया?
हिंदी में एक तरह से अभी ज्ञान-सृजन का काम शुरू किया जाना है. अब तक हमारा ध्यान मात्र शब्दों की खोज पर रहा है. इसमें हमारी सहज द्विभाषिकता एक बड़ा सहारा हो सकती है. हिंदी में अनुशासन विशेष में संवाद के लिए आवश्यक उत्सुक समूह का होना भी ज़रूरी है. एक दूसरा तरीका विज्ञान जैसे विषयों के अध्ययन के साथ हिंदी को सम्बद्ध करने का हो सकता है. ये फैसले लेकिन जितने अकादमिक संसार के भीतर के हैं, उससे कहीं •यादा विकास की राजनीति के हैं. ऐसी शिक्षा व्यवस्था जो माध्यमिक स्तर पर ही आबादी के बहुलांश को बाहर कर देती है, श्रेष्ठता की भ्रामक समझ पर आधारित है. खून जला कर अंग्रेज़ी सिखाने की राजनीति विकास की जिस समझ पर आधारित है, उससे लड़े बिना हिंदी में ज्ञान निर्माण के प्रश्न का हल नहीं निकल सकता.
जब तक इस पर बहस नहीं होगी कि हिंदी में ज्ञानात्मक भाषा न होने का मामला मात्र हिंदी की न्यूनता से नहीं, ज्ञानानुशासों की विपन्नता से भी जुड़ा हुआ है, बात आगे नहीं बढ़ेगी. जो ज्ञान अपने समाज से बात नहीं कर सकता वह ज्ञान ही क्योंकर है, यह प्रश्न ज्ञानमीमांसा का है. हिंदी का संघर्ष इसलिए वास्तविक ज्ञानमीमांसात्मक संघर्ष के साथ राजनीतिक संघर्ष से भी जुड़ा हुआ है. लेकिन यहां तक लिखते हुए मुङो यह लगने लगा है कि कोई नयी बात तो कही नहीं मैंने. आखिरकार चाहिए वह साहस जो अ™ोय ने बहुत पहले किया था और जिसके बारे में कहा था कि हिंदी में लिखने का फैसला अपने आप में साहस का काम है. अज्ञेय ने मैकॉले-क्षण का अतिक्र मण एक नये मिजाज के हिंदी गद्य का निर्माण करके किया. कथात्मक गद्य में वर्णन मात्र नहीं, चिंतन संभव है और उसे आयात करना प्रयत्न साध्य है, यह उन्होंने दिखाया. सहजता भी दीर्घ आयास के बाद ही आ पाती है. अंगरेजी में सहजता की यह साधना की गयी. हमारे विद्वानों में से अनेक ने, जैसा सतीश देशपांडे कहते हैं, खुद पर भयंकर अत्याचार करके यह साधना की. साधना का यह साहस, जो अज्ञेय ने किया, हमारे विश्वविद्यालय कर पायेंगे, इसमें मुङो संदेह है लेकिन इसे लेकर कोई दुविधा नहीं कि अगर ऐसा वे कर पाये तो स्वस्थ और समृद्ध ही होंगे.
अपूर्वानंद
लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक हैं.