विश्व शांति के लिए ये हैं बड़े खतरे

अमेरिका ने 9/11 के बाद समूची दुनिया को समझाने की कोशिश की कि ‘इसलामिक आतंकवाद’ विश्व शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा है, लेकिन आज दुनियाभर में अमेरिका को ही विश्वशांति के लिए सबसे बड़े ‘खतरे’के रूप में देखा जाता है. यह बात सामने आयी है विन/ गैलप इंटरनेशनल द्वारा किये गये हालिया सर्वेक्षण में. […]

By Prabhat Khabar Digital Desk |

अमेरिका ने 9/11 के बाद समूची दुनिया को समझाने की कोशिश की कि ‘इसलामिक आतंकवाद’ विश्व शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा है, लेकिन आज दुनियाभर में अमेरिका को ही विश्वशांति के लिए सबसे बड़े ‘खतरे’के रूप में देखा जाता है. यह बात सामने आयी है विन/ गैलप इंटरनेशनल द्वारा किये गये हालिया सर्वेक्षण में. इस मामले में अमेरिका के बाद चीन, पाकिस्तान, अफगानिस्तान जैसे देशों को बड़े खतरे के तौर पर देखा जा रहा है. विश्व शांति को किससे और क्यों है खतरा, बता रहे हैं चिंतक सुभाष गाताडे.

अगर दुनिया के 68 मुल्कों की (सर्वेक्षण में शामिल) चौबीस फीसदी जनता एक मुल्क विशेष को निशाने पर ले, तो तय है कि उस मुल्क के नीति-निर्माताओं को अपने बारे में सोचने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है. इतना ही नहीं, ऐसे सर्वेक्षण में जब आप के दोस्त या सहयोगी मुल्क भी शामिल हों या अपने मुल्क की जनता भी यह सोचती हो, तो कोई भी कहेगा कि ‘मामला वाकई गड़बड़’ है. नये साल की शुरुआत कम से कम अमेरिका के लिए बुरी खबर के साथ हुई है. राष्ट्रपति बराक ओबामा के लच्छेदार भाषण या हाल में इरान के साथ शांति प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए उठे नये कदम आदि के चलते उसकी प्रचलित छवि पर कोई असर पड़ता नहीं दिख रहा है, विश्व जनमत उसे ही दुनिया की शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है. मालूम हो कि विन/ गैलप इंटरनेशनल द्वारा किये गये ताजा सर्वेक्षण में यह बात सामने आयी है. स्पष्ट है कि 9/11 के बाद भले ही अमेरिका ने पूरी दुनिया को यह समझाने की कोशिश की हो कि ‘इसलामिक आतंकवाद’ विश्व शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा है, पर दुनिया की अवाम ने अपने ढंग से इस ‘खतरे’ को देखा है.

कैसे हुआ सव्रेक्षण

विन/ गैलप इंटरनेशनल, 1977 से ही ऐसे वैश्विक सर्वेक्षणों को अंजाम दे रहा है और यह लगातार कई साल से हो रहा है कि अमेरिका को ही यह ‘खिताब’ मिल रहा है. अब जहां तक प्रस्तुत सर्वेक्षण का सवाल है, तो उसके द्वारा 68 देशों के लोगों से की गयी बातचीत के आधार पर यह नतीजे निकाले गये हैं. हर मुल्क में उन्होंने तकरीबन एक हजार लोगों से बात की है और इस तरह कुल 66,806 लोगों से बातचीत कर यह निष्कर्ष निकाला है.

सर्वेक्षण में शामिल बाकी आंकड़ों पर गौर करेंगे, तो कुछ अन्य देशों की सूची भी सामने आती है. अमेरिका के बाद दूसरा नंबर पाकिस्तान (8 फीसदी), उसके बाद चीन (6 फीसदी), अफगानिस्तान, इरान, इसराइल और उत्तरी कोरिया (5 फीसदी), भारत, इराक और जापान (4 फीसदी), सीरिया (3 फीसदी), रूस (2 फीसदी), आस्ट्रेलिया, जर्मनी, फिलिस्तीनी इलाके, सऊदी अरब, सोमालिया, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन (1 फीसदी) आदि. एपीएनओआरसी सेंटर फॉर पब्लिक अफेयर्स द्वारा जारी एक अन्य जनमत संग्रह में 50 फीसदी ने माना कि अमेरिका की राजनीतिक प्रणाली में ‘आमूलचूल बदलाव’ की जरूरत है.

ब्रिटेन भी लपेटे में

वैसे विन/ गैलप सर्वेक्षण पर लौटें, तो कुछ अन्य सवाल तत्काल मन में उठ सकते हैं. उदाहरण के तौर पर अमेरिका का अभिन्न सहयोगी ब्रिटेन- जिसने विगत लगभग एक दशक में ही नहीं, बल्कि उसके पहले से ही अमेरिका की सामरिक नीतियों का खुल कर साथ दिया है; अमेरिका द्वारा यह तय किये जाने के बाद फलां मुल्क को सबक सिखाना जरूरी है, उसने अपनी सेनाएं भेजने में भी संकोच नहीं किया है, उस ब्रिटेन के बारे में विश्व जनमत का एक फीसदी हिस्सा ही उसे खतरा मानता है. सर्वेक्षण में इसराइल की स्थिति को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं, मध्यपूर्व में स्थित यह नाभिकीय हथियार से लैस एकमात्र मुल्क है और अपने निर्माण की नींव पड़ने के बाद से ही उसने अमेरिका के अभिन्न सहयोगी के तौर पर अरब मुल्कों पर अंकुश रखने की कोशिश की है, फिलिस्तीनी जनता की आकांक्षाओं को लगातार रौंदा है, जिसके खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में कई बार प्रस्ताव पास हुए हैं; यह अलग बात है कि अमेरिका ने वीटो का इस्तेमाल कर उसे बचाया है. अव्वल चार में शामिल पाकिस्तान व अफगानिस्तान के बारे में भी यह राय आ सकती है कि उनकी मौजूदा स्थिति के लिए क्या अमेरिका ही जिम्मेदार नहीं कहा जाना चाहिए, जिन्होंने इन देशों को हथियारों से लैस करने में कोई संकोच नहीं किया.

अमेरिका : खतरा नंबर एक

अमेरिका को लेकर सबसे अधिक विरोधी भावनाएं उन मुल्कों में अधिक दिखाई दी हैं, जो अमेरिका के प्रतिद्वंदी समङो जाते हैं. रूस में 54 फीसदी लोगों ने, तो चीन के 49 फीसदी लोगों ने यही कहा. अमेरिका के सहयोगी कहे जानेवाले कुछ मुल्कों के जनमत की बात करें (उदाहरणार्थ नाटो सहयोगी ग्रीस और तुर्की के 45 फीसदी लोग) और पाकिस्तान (जिसे काफी अमेरिकी सहायता मिलती है) के 44 फीसदी लोग भी यही मानते हैं. लातिन अमेरिकी देशों में भी अमेरिका को चाहनेवाले अधिक नहीं हैं.

यूरोपीय संघ में भी मिश्रित छवि दिखती है. लातिन अमेरिका के 37 फीसदी, ब्राजील के 26 फीसदी और पेरू के 24 फीसदी लोगों ने अमेरिका पर ही उंगली उठायी. अमेरिका के साथ ‘नाफ्टा’ नामक मुक्त व्यापार समझौते में शामिल मेक्सिको (37 फीसदी) और कनाडा के 17 फीसदी लोगों ने भी अमेरिका को ही निशाने पर रखा है. यूक्रेन में इन दिनों यूरोपीय यूनियन से जुड़ने को लेकर जनांदोलन चल रहा है, जबकि वहां का शासकवर्ग रूस के साथ खड़ा होना दिखाता है. वहां 33 फीसदी लोगों ने अमेरिका को ही खतरा माना, जबकि महज पांच फीसदी लोगों ने रूस को चिह्न्ति किया. अगर अमेरिका की बात करें तो 20 फीसदी लोग अफगानिस्तान एवं उत्तरी कोरिया को और महज 15 फीसदी ईरान को अपना दुश्मन मानते हैं, जबकि 13 फीसदी लोग स्वयं अमेरिका को ही सबसे बड़ा खतरा समझते हैं. इस सर्वे के बहाने सामने आये चंद और तथ्य गौरतलब हैं. यह सोचने का मसला है कि आखिर विश्व जनमत का लगभग चौथाई हिस्सा अमेरिका को लेकर ऐसा क्यों सोचता है? वजह स्पष्ट है कि इसका ताल्लुक दुनिया का चौधरी बने रहने की उसकी आकांक्षाएं हैं, बात-बात पर दुनिया के देशों को सबक सिखाने के लिए उसके द्वारा किये गये हस्तक्षेप हैं, दुनियाभर में फैले उसके सैनिक अड्डे हैं, आतंकवाद को लेकर उसका दोहरा रुख है, इसराइल जैसे कई अलोकप्रिय मुल्कों को उससे मिला अंधा समर्थन है और एडवर्ड स्नोडेन द्वारा किये गये वे रहस्योद्घाटन हैं कि किस तरह अमेरिका दोस्त व दुश्मन देशों की, उनके नागरिकों की जासूसी करता है.

अमेरिकी सैन्य अड्डे

मालूम हो कि आज की तारीख में अमेरिकी सेनाएं 130 मुल्कों में तैनात हैं, जिन्होंने 900 से अधिक सैनिक अड्डे कायम किये हैं. अगर हम अन्य अध्ययनों पर गौर करें तथा इराक व अफगानिस्तान में बने सैनिक अड्डों को भी जोड़ें, तो सैनिक अड्डों की संख्या 1,000 तक पहुंचती है, जहां एक लाख से अधिक सैनिक तैनात हैं और इनके रखरखाव के लिए सालाना 102 बिलियन डॉलर खर्च होते हैं.

यूएस मिलिटरी बेसेस जनरेट रिसेंटमेंट, कैटरीना हयूवेल, 3 जून, 2011 बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइन्सेज’ में अपने आलेख में मानववंश विज्ञानी गुस्टेरसन रेखांकित करते हैं कि अमेरिकी सैनिक अड्डों की संख्या पूरी दुनिया में अन्य देशों द्वारा दूसरे मुल्कों में कायम सैनिक अड्डों का 95 फीसदी है. खुद अमेरिका के अंदर बने कार्यदल ने इस कड़वी सच्चाई को भी रेखांकित किया है कि जितने बड़े पैमाने पर सैनिक अड्डों के साम्राज्य पर राशि खर्च की जाती है, उसके चलते हम अधिक सुरक्षित कतई नहीं हो रहे हैं, बल्कि अमेरिका के खिलाफ जनअसंतोष बढ़ने का वह ठोस कारण बनते दिख रहे हैं.

बहुत कम लोग जानते हैं कि अमेरिका ने अपनी सरजमीं पर ‘स्कूल ऑफ अमेरिकाज’ के नाम से एक संगठन गठित किया है, जिसे अब ‘वेस्टर्न हेमिस्फियर इंस्टीट्यूट फॉर सिक्युरिटी कोऑपरेशन’ नाम से भी जाना जाता है. जानने योग्य है कि अमेरिकी करदाताओं के सहारे चल रहे इस स्कूल ने गठन के बाद से अब तक 15 देशों के साठ हजार से अधिक लोगों को प्रशिक्षित किया है. इन्होंने अपने मुल्क लौटने के बाद मानवाधिकारों के जबरदस्त उल्लंघन किये हैं या फिर यातना देने, लोगों को फर्जी मुठभेड़ों में मारने तथा कत्लेआमों के लिए बदनाम हुए हैं. दरअसल, जॉर्जिया के फोर्ट बेनिंग स्थित इस संस्थान की शुरुआत वर्ष 1946 में पनामा में हुई थी, जिसे 1984 में यहां स्थानांतरित किया गया.

विकीलिक्स ने कुछ साल पहले अमेरिका के अफगान युद्ध से जुड़े 70 हजार से अधिक आंतरिक दस्तावेज जारी कर दुनियाभर में तहलका मचा दिया था. उसने अपना यह मिशन बना लिया है कि वह दुनियाभर की जालिम हुकूमतों या कॉरपोरेट सम्राटों की अपारदर्शिता को दुनिया के सामने लायेगा. एक भंडाफोड़ में अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी ‘सीआइए’ के रेड सेल का यह आंतरिक दस्तावेज पेश किया है, जो सीआइए के भीतर आंतरिक बहस के लिए 2 फरवरी, 2010 को रखा गया था. इस दस्तावेज के मुताबिक आतंकवाद में मुब्तिला अमेरिकी नागरिकों की सामने आ रही घटनाएं अमेरिका को ‘आतंकवाद से पीड़ित’ नहीं बल्कि ‘आतंकवाद का निर्यातक देश’ घोषित कर सकती है. रेड सेल इस बात के प्रति स्पष्ट है कि आतंकवाद का अमेरिकी निर्यात कोई हाल की परिघटना नहीं है, न ही उसका ताल्लुक सिर्फ इसलामिक अतिवादियों से या मध्यपूर्व में जन्में लोगों से या अफ्रीकी या दक्षिण एशियाइ नस्लीय मूल के लोगों से है. यह गतिविज्ञान इस अमेरिकी विश्वास को खारिज करता है कि वहां का आजाद, खुला और एकीकृत बहु सांस्कृतिक समाज अतिवाद के प्रति या आतंकवाद के प्रति लोगों के सम्मोहन को कमजोर करता है.

रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि अमेरिका द्वारा ‘आतंकवाद के निर्यात’ को लेकर पनपती धारणा तथा अंतरराष्ट्रीय कानून के हिसाब से अमेरिका के दोहरे पैमाने का यह सिलसिला आगे बढ़ा, तो यह स्थिति भी बन सकती है कि भविष्य में बाकी मुल्क आतंकी घटनाओं को लेकर अमेरिका को सहयोग देना बंद कर दें. 26/11 के आतंकी हमले का मास्टरमाइंड और सीआइए एवं लश्कर-ए-तोइबा के डबल एजेंट डेविड हेडली को भारत को सौंपने से इनकार करनेवाला अमेरिका आखिर किस मुंह से विश्व शांति का रखवाला कहलवा सकता है?

पाकिस्तान : खतरा नंबर दो

मन की आंखों के सामने हम पाकिस्तान की छवि लाने की कोशिश करें तो क्या तसवीर नजर आ सकती है. इसे अमेरिका के बाद विश्व शांति के लिए खतरे के तौर पर दूसरे नंबर पर रखा गया है. हम पायेंगे तालिबानियों का समाज में बढ़ता प्रभाव, पाकिस्तान की सीमाओं पर अमेरिकी सेनाओं के सहयोग से होने वाले ड्रोन हमलाें में मारे जानेवाले मासूम और नाभिकीय हथियारों से संपन्न यह मुल्क जहां ‘डीप स्टेट’ अर्थात ‘परदे के पीछे’ से संचालित राज्य के तौर पर उसकी गुप्तचर एजेंसी आइएसआइ की गतिविधियां. इस बात के आसानी से कयास लगाये जा सकते हैं कि किन वजहों से लोगों ने उसे खतरे के तौर पर देखा होगा.

पहली, ऐसा नाभिकीय मुल्क जहां मुल्क के पश्चिमी भाग में अल-कायदा या तालिबान जैसी ताकतें वास्तविक नियंत्रण में हैं या उनका अंकुश है, जिसके चलते यह डर हमेशा रहता होगा कि अगर गलती से नाभिकीय हथियार इनके हाथ लगे तो दुनिया में दिक्कत बढ़ सकती है. दूसरी, अहम बात यह भी है कि पश्चिमी जगत में इसलामिक आतंकियों की गिरफ्तारी के कई ऐसे मामले सामने आये हैं, जहां यह पता चला है कि उन्होंने पाकिस्तान में प्रशिक्षण हासिल किया है. पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी आइएसआइ के साथ या वहां की सेना के साथ लश्कर-ए-तोइबा, जैश-ए-मोहम्मद जैसे अतिवादी संगठनों के रिश्तों की भी बात होती है. देश के गठन के बाद से वहां कभी लोकतंत्र की जड़ें मजबूत नहीं हुई. तरह-तरह के फौजी तानाशाहों का शासन रहा या फौज का लगातार नागरिक शासन में हस्तक्षेप रहा. लाजिम था कम्युनिजम विरोध की अपनी परियोजना में अमेरिका ने उसे बखूबी शामिल किया था और उसकी फौज को भी खूब सहायता दी थी. पिछले कुछ माह से यह खबर भी आई है कि पाकिस्तानी सरकार तालिबानियों के साथ समझौता वार्ता करने पर आमादा है. वहीं, स्वात घाटी के इलाके में एक तरह से लड़कियों की शिक्षा पर पाबंदी लगानेवाले तालिबान ने अपने इस निर्देश को मनवाने के लिए स्कूलों को बमों से उड़ा दिया है. भारत में पाकिस्तान को सबसे बड़ा खतरा माना गया है.

चीन: खतरा नंबर तीन

चीन को विश्व शांति के लिए खतरा नंबर तीन कहा जा रहा है. जहां तक चीन की बात है तो फौरी तौर पर जापान के साथ उसके बढ़ते तनाव को इलाकाई स्तर पर और वैश्विक स्तर पर खतरे के तौर पर देखा जा सकता है. ‘अल्टरनेट डॉट ऑर्ग’ पर लिखे अपने आलेख में अमेरिकी पत्रकार सारा वूल्फ बताती हैं कि अभी पिछले माह ही चीन ने पूर्वी चीनी समुद्र को घेरनेवाले इलाके को ‘एयर डिफेंस आइडेंटिफिकेशन जोन’ घोषित किया. इस इलाके में कुछ ऐसे क्षेत्र भी शामिल हैं, जिन पर जापान और दक्षिणी कोरिया भी अपना दावा करता है. अभी पिछले ही माह अमेरिकी नौसेना जहाज ने इस डिफेंस जोन में एक चीनी फौजी जहाज को घेरा था. इस इलाके में वियतनाम और फिलीपिंस के साथ चीन के सीमा के विवाद कायम हैं.

अफगानिस्तान : चौथा खतरा

विश्व शांति के लिए चौथे नंबर के खतरे में शुमार अफगानिस्तान के बारे में एक गुप्तचर रिपोर्ट में बताया गया है कि अपनी सैनिक कार्रवाइयों को समेटते हुए अमेरिका जब इस इलाके से हटेगा, तब तालिबान और अल-कायदा की कार्रवाइयों पर से परदा उठेगा. दस साल से ज्यादा समय से यहां इन देशों की सेनाओं की मौजूदगी के बावजूद तालिबानी ताकतें नये सिरे से जोर पकड़ रही हैं. यहां तक कि राष्ट्रपति करजई को कई बार ‘काबुल का मेयर’ के तौर पर भी व्यंग्य में संबोधित किया जाता रहा है, क्योंकि उसके शासन की पकड़ बहुत दूर तक नहीं है. अफगानिस्तान में कायम तालिबानी हुकूमत को हटा कर (जिसके लिए अमेरिका, ब्रिटेन तथा अन्य पश्चिमी देशों की सेनाएं लगी थीं) वहां अपने वफादार करजई को हुकूमत सौंपने में खुद अमेरिका की ही केंद्रीय भूमिका रही है. आज की तारीख में अफगानिस्तान एक तरह से विभिन्न किस्म के ‘युद्धसरदारों की रणभूमि’ बना है, जहां अल-कायदा जैसे अतिवादी तत्वों को भी पनाह मिलती है. जाहिर है कि विश्व जनमत को अफगानिस्तान को इस फेहरिस्त में शुमार करने में यह तमाम पहलू मद्देनजर रहे होंगे.

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