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नयी तकनीकों से नियंत्रण में होगा इलाज का खर्च

हेल्थकेयर टेक्नोलॉजी शामिल हो रही नयी डिवाइसेस और मोबाइल एप्स आम लोगों को कई तरह की मेडिकल जांच की भारी-भरकम खर्चो से राहत दे रही हैं. इससे ब्लड प्रेशर मापने से लेकर हॉर्ट रेट तक, यूरीन की जांच से लेकर शरीर में ग्लूकोज की मात्र की सही जानकारी हासिल करना बेहद आसान हो गया है. […]

By Prabhat Khabar Digital Desk | January 6, 2015 7:33 AM
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हेल्थकेयर टेक्नोलॉजी शामिल हो रही नयी डिवाइसेस और मोबाइल एप्स आम लोगों को कई तरह की मेडिकल जांच की भारी-भरकम खर्चो से राहत दे रही हैं. इससे ब्लड प्रेशर मापने से लेकर हॉर्ट रेट तक, यूरीन की जांच से लेकर शरीर में ग्लूकोज की मात्र की सही जानकारी हासिल करना बेहद आसान हो गया है. सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग ने परंपरागत इलाज की तकनीक पर हमारी निर्भरता कम कर दी है.
आगे हेल्थकेयर तकनीकें हमारे जीवन को कितना करेंगी प्रभावित, इस वर्ष और कितने हेल्थकेयर डिवाइसेस और मोबाइल एप से हम होंगे रूबरू, बता रहा है आज का नॉलेज..
ब्रह्मानंद मिश्र
अच्छा स्वास्थ्य इंसान की खुशी का आधार होता है. अच्छे स्वास्थ्य के बगैर विकास जैसे शब्दों का कोई अर्थ नहीं रह जाता. अपने देश में महंगा इलाज हर साल 6.3 करोड़ लोगों को गरीब बना रहा है. केंद्र सरकार की नयी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के मसौदे में कहा गया है कि ‘गरीबी में सबसे बड़ा योगदान महंगे इलाज का है. महंगे इलाज के लिए कोई प्रोटेक्शन कवर नहीं होने की वजह से लोगों को गरीबी कम करने के लिए चलाये जा रहे सरकारी कार्यक्रमों और बढ़ी आय का फायदा नहीं मिल पाता.’ मसौदे के मुताबिक, 2011-12 में इलाज पर परिवार के खर्च का हिस्सा ग्रामीण इलाकों में 6.9 प्रतिशत, जबकि शहरों में 5.5 प्रतिशत था. साल 2004-05 में 15 प्रतिशत परिवारों को महंगे इलाज का सामना करना पड़ता था, जबकि 2011-12 में बढ़कर 18 प्रतिशत परिवार तक पहुंच चुका है.
जिस देश में जनसमूह के स्तर पर स्वास्थ्य की समस्याएं हैं, वहां व्यक्ति और देश के सामने हजारों चुनौतियां सामने आ सकती हैं. यही कारण है कि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे समृद्ध देशों में स्वास्थ्य सेवा का खर्च जीडीपी के आठ प्रतिशत से ऊपर रहता है. विकासशील देशों में आम जनता को जहां मूलभूत स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है, वहीं विकसित देशों में लोगों को इलाज के लिए भारी-भरकम खर्चे से जूझना पड़ता है. लेकिन, हेल्थकेयर के क्षेत्र में हाल के वर्षो में आयी कुछ नयी तकनीकों ने सस्ते इलाज की उम्मीद जगायी है और आम लोगों के लिए मेडिकल चेकअप जैसे खर्चो को काफी कम कर दिया है.
‘यूनाइटेड नेशंस इकोनॉमिक एंड सोशल कमीशन फॉर एशिया एंड द पैसिफिक’ की रिपोर्ट के अनुसार, दुनियाभर में बड़े-बुजुर्गो की कुल आबादी का आधा हिस्सा एशिया पैसिफिक क्षेत्र से है. एक अनुमान के मुताबिक, कुछ दशकों में यह आबादी दोगुने से भी ज्यादा हो जायेगी और हर चौथे व्यक्ति की आयु 60 वर्ष के आसपास होगी. इस विशेष आबादी को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करा पाना सभी देशों के लिए बड़ी चुनौती होगा. एक बात तो स्पष्ट है कि परंपरागत इलाज विधि से इन समस्याओं से निपटना असंभव है. बढ़ती जरूरतों के लिए निश्चित तौर पर निर्भरता विभिन्न तकनीकों पर बढ़ेगी.
खर्च का तकनीकी विकल्प
आमतौर पर प्रभावी मेडिकल तकनीकें अन्य तकनीकों के मुकाबले महंगी होती हैं और बाजार में इनकी पहुंच भी सीमित होती है. दुनियाभर में ऐसी कई बीमारियां है जो चिरस्थायी हैं और तेजी से आम लोगों को चपेट में ले रही हैं. खासकर डायबिटीज, फेफड़ों से संबंधित बीमारियां और अल्जाइमर आदि हेल्थकेयर सिस्टम और विभिन्न सरकारों पर भारी बोझ बन रही है. इन बीमारियों में सबसे सामान्य यह है कि यदि डॉक्टर समय रहते इन बीमारियों की सही पहचान कर लें तो एक हद तक इनकी रोक-थाम संभव है. मेडिकल तकनीकों पर आधारित रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर काम कर रही कंपनियों के लिए यह सबसे बड़ा लक्ष्य है. लेकिन यह इतना आसान नहीं है, क्योंकि ग्लोबल हेल्थकेयर मार्केट के सामने इन तकनीकी उत्पादों को सस्ता कर पाना और बीमारी मापक विधि को सर्वसुलभ बनाना दोनों ही चुनौतीपूर्ण है. बावजूद इसके कुछ नामी कंपनियां मेडिकल तकनीकी उत्पादों को विकसित करने की दिशा में काम कर रही हैं, जो निकट भविष्य में इलाज के लिए सस्ता माध्यम बनेंगी.
कांटेक्ट लेंस और टिंके सेंसर
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, गूगल और फार्मास्युटिकल कंपनी नोवार्टिस स्मार्ट कांटेक्ट लेंस को विकसित कर रही है. इस लेंस से संबंधित व्यक्ति के आंसुओं से ग्लूकोज का स्तर मापा जा सकेगा. ऐसे में डायबिटीज रोगियों के इलाज के लिए यह सस्ता और सुलभ माध्यम बनेगा.
बायोस्पेक्ट्रम एशिया की रिपोर्ट के मुताबिक, सिंगापुर की कंपनी जेनसोरियम ‘टिंके सेंसर’ विकसित कर रही है. इस बेहद छोटी डिवाइस को उपभोक्ता के स्मार्टफोन से जोड़ा जा सकेगा, जिसके माध्यम से हर्ट रेट से लेकर फेफड़ों के संक्रमण और ऑक्सीजन की मात्र तक की जानकारी प्राप्त की जा सकेगी.
खुद से स्वास्थ्य की देखभाल
स्वास्थ्य सेवाओं को सस्ता व सुगम बनाने के लिए तकनीक की भूमिका महत्वपूर्ण होती जा रही है. प्राइसवाटरहाउसकूपर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष डिजिटल आधारित मेडिकल ट्रीटमेंट, हेल्थकेयर मोबाइल एप और उपभोक्ता केंद्रित तकनीकें अहम साबित होंगी.
अमेरिका सहित विभिन्न देशों में ‘पर्सनल मेडिकल किट’ के विस्तार और लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया जा रहा है. तकनीकी कंपनियां मोबाइल मेडिकल डिवाइसेस और एप्लीकेशन की सुविधा मुहैया करा रही हैं, जिससे ब्लडप्रेशर, यूरिन की सही स्थिति पता लगाने के साथ-साथ दवाओं आदि के बारे में भी जानकारी प्राप्त की जा सकेगी.
स्वास्थ्य तकनीकों के लिहाज से वर्ष 2015 कई मायनों में अहम साबित होने जा रहा है. इस वर्ष वैश्विक स्तर पर आयोजित होनेवाली प्रतियोगिता क्वालकॉम ट्राइकोर्डर एक्स-प्राइज का फाइनल निर्णय पर्सनल हेल्थकेयर डिवाइस की कामयाबी पर निर्भर करेगा. इस डिवाइस के माध्यम से एक साथ 16 विभिन्न स्थितियों की जानकारी प्राप्त की जा सकेगी.
इनमें एनीमिया, आट्रियल फाइब्रिलेशन, फेफड़ा संक्रमण, डायबिटीज, हेपेटाइटिस ए, ल्यूकोसाइटोसिस, निमोनिया, कानों का संक्रमण, अनिद्रा, स्ट्रोक, टय़ूबरकुलोसिस, यूरेनरी इंफेक्शन समेत विभिन्न स्थितियों की निगरानी की जा सकेगी. पिछले वर्ष डिस्पोजेबल बायोसेंसर सिस्टम सहित 24 डिजिटल हेल्थ डिवाइसेस लोगों के बीच पहुंची. उम्मीद की जा रही है कि इस वर्ष कुछ नयी डिवाइसेस बाजार में आयेंगी.
एप से मेडिकल डिवाइस तक
प्रमाणित व पोर्टेबल मेडिकल डिवाइसेस मरीजों को घर पर ही चेकअप आदि की सुविधा मुहैया कराती हैं. अमेरिका जैसे देशों में हेल्थकेयर सिस्टम को बेहतर बनाने व खर्चो को कम करने के लिए विभिन्न तकनीकों की मदद ली जा रही है और स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले अन्य कारकों, बर्ताव और सामाजिक मुद्दों पर ध्यान दिया जा रहा है. इसमें हाइटेक वीयरेबल्स, वचरुअल केयर प्रमुख हैं.
‘ऑस्नेर हेल्थ सिस्टम’ एक ऐसे हेल्थ एप को विकसित कर रहा है, जिसमें फिजिशियन का राइट-अप भी शामिल होगा. पिछले वर्ष की शुरुआत में एप्पल आधारित ‘ओ बार’ नाम के एप की शुरुआत की गयी थी. इस एप के माध्यम से फिटनेस, डाइट और महिलाओं के स्वास्थ्य की जानकारी प्राप्त की जा सकती है. ब्रिटेन में कैंब्रिज हेल्थ केयर अपने एप के माध्यम से लोगों को स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों के लिए मार्गदर्शन करता है.
गोपनीयता का संतुलन
दुनियाभर में करोड़ों मरीजों को हेल्थ सिस्टम के साथ अपनी व्यक्तिगत और गोपनीय जानकारियों को साझा करना पड़ता है, क्योंकि हेल्थ रिकॉर्ड में मेडिकल डाटा के साथ-साथ व्यक्तिगत और आर्थिक जानकारी को शामिल किया जाता है. इन जानकारियों के चोरी होने का खतरा रहता है. 2015 में डाटा प्राइवेसी हेल्थ सिस्टम के साथ-साथ आम लोगों के लिए बड़ी चुनौती होगी. हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टेबिलिटी एंड एकाउंटेबिलिटी एक्ट प्रोग्राम के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर ब्रायन किसिंगर का मानना है कि चोरी किये गये डाटा का इस्तेमाल आर्थिक लाभ के लिए भी किया जा सकता है.
पिछले कुछ वर्षो में तेजी से बढ़े उपभोक्तावाद ने लोगों को मोबाइल जैसी डिवाइसेस में पर्सनल डाटा स्टोर करने के लिए प्रेरित किया है. सेवाओं का बेहतर इस्तेमाल करने की इच्छा रखनेवाले ज्यादातर उपभोक्ता ज्यादा सोचे-समझे बिना पर्सनल डाटा का इस्तेमाल करते हैं. इससे जानकारियां क्लाउड में इकट्ठा होने के कारण हैकरों के लिए डाटा चुराना आसान हो जाता है.
पिछले वर्ष गूगल ग्लास जैसे आविष्कार हेल्थकेयर के क्षेत्र में नयी उम्मीदें लेकर आये. विभिन्न रिपोर्टो के मुताबिक इस वर्ष कुछ अन्य डिजिटल तकनीक लोगों की जिंदगी में बड़ा बदलाव लायेंगी. उधर, ‘रेफरल एमडी’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, अभी 29 फीसदी अमेरिकी अपने दिन की शुरुआत फोन संग करते हैं. इस डिवाइस ने हेल्थकेयर प्रैक्टिशनर को इलाज का सस्ता, तेज व प्रभावी विकल्प मुहैया कराया है.
माइक्रोचिप मॉडलिंग क्लीनिकल ट्रायल
इस विधि का खास मकसद जानवरों पर होनेवाले क्लीनिकल ट्रायल की परंपरागत विधि को खत्म करना है. दूसरा उद्देश्य इंसानों के इलाज को प्रभावी और सुरक्षित बनाना है. प्रयोग में आनेवाली माइक्रोचिप इंसान के अंगूठे से छोटी होती है, जो ऑर्गन और कैपेलिरी (केशिका : एक बेहद बारीक टय़ूब की तरह संरचना) के बीच इंटरफेस बना सकता है. यह तकनीक बिल्कुल माइक्रोफैब्रिकेशन की तरह होती है.
गूगल ग्लास व अन्य वीयरेबल टेक्नोलॉजी
शरीर पर धारण की जानेवाली डिवाइसेस निकट भविष्य में हेल्थकेयर रिसर्च में व्यापक भूमिका अदा करेंगी. रॉफेल ग्रासमैन सजर्री के लिए गूगल ग्लास के इस्तेमाल करनेवाले पहले सजर्न हैं. गूगल ग्लास जैसी डिवाइसेस यूजर और हेल्थ प्रैक्टिशनर के लिए उपयोगी है. गूगल ग्लास से प्रैक्टिशनर के लिए मेडिकल हिस्ट्री प्राप्त करना आसान है, वहीं मेडिकल स्टूडेंट व प्रोफेशनल के लिए यह रीयल टाइम एजुकेशन का माध्यम भी बन रहा है.
3डी प्रिंटेड बायोलॉजिकल मैटीरियल
हेल्थकेयर के क्षेत्र में थ्री-डी प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी बड़ी भूमिका अदा कर रही है और निकट भविष्य में इस तकनीक पर अन्य अविष्कार लोगों के लिए कई बड़ी सुविधाएं लेकर आयेगा. अब तक की बात करें तो इब्रायनिक स्टेम के लैब में 3डी प्रिंटिंग में कामयाबी मिल चुकी है. आगे इस तकनीक का इस्तेमाल ड्रग टेस्ट और नये ऑर्गन को विकसित करने के लिए भी किया जा सकेगा. इसके अलावा यह तकनीक कैंसर के अध्ययन, सजर्री, हड्डियों को विस्थापित करने, ब्लड वेसल और हृदय ऊतकों के लिए भी किया जा सकेगा.
प्रकाश अनुवांशिकी
न्यूरोसाइंस में प्रयोग की जा रही ऑप्टोजेनेटिक्स (प्रकाश अनुवांशिकी) तकनीक का भविष्य रिसर्च और डेवलपमेंट की नयी ऊंचाइयां छू सकता है. मेडिकल कम्युनिटी के बीच ऑप्टोजेनेटिक्स चर्चा के सबसे बड़े मुद्दों में है. इस तकनीक का मुख्य उद्देश्य मस्तिष्क के क्रिया-कलापों को प्रकाश द्वारा नियंत्रित करना है. साथ ही इसकी मदद से ब्रेन के जटिल न्यूरॉन नेटवर्क को समझने में आसानी होगी.
डाइजेस्टेबल सेंसर
इस तकनीक की मदद से हेल्थकेयर प्रोफेशनल को मानव शरीर के ऑर्गन को प्रभावित करने वाले कारकों और इलाज का हल ढूंढ़ने में मदद मिलेगी. विशेष प्रकार का यह सेंसर मरीज के शरीर की आंतरिक सूचनाओं को भेजता है. यह तकनीक मरीजों को दवा लेने की जानकारी, शरीर से जुड़ी सूचनाओं को स्मार्टफोन और कंप्यूटर पर भेजेगी.
हेल्थकेयर और सोशल मीडिया
40प्रतिशत से अधिक सोशल मीडिया यूजर सोशल मीडिया से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर स्वास्थ्य दिनचर्या या गतिविधियों में परिवर्तन लाते हैं. अमूमन सोशल मीडिया से प्राप्त जानकारियों पर लोग आसानी से विश्वास करते हैं, लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि सोशल मीडिया से प्राप्त सूचनाओं पर आसानी से विश्वास नहीं किया जा सकता.
18-24 वर्ष आयु वर्ग के लोग स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर सोशल मीडिया पर होनेवाली बहसों में शामिल होते हैं. हालांकि, 45 से 54 वर्ष के लोगों की इन मुद्दों पर सक्रियता कम होती है. कई मामलों में हेल्थ प्रोफेशनल आम लोगों से सीधे तौर पर जुड़ते हैं.
90 प्रतिशत ऐसे लोग, जिनकी आयु 18 वर्ष से 24 वर्ष के बीच है, सोशल मीडिया पर अन्य लोगों द्वारा साझा होने वाली मेडिकल सूचनाओं पर विश्वास करते हैं.
31 प्रतिशत हेल्थ केयर ऑर्गेनाइजेशन सोशल मीडिया पर सूचनाओं को साझा करते हुए विशेष सोशल मीडिया मानकों का इस्तेमाल करते हैं.
19 प्रतिशत स्मार्टफोन यूजर कम से कम एक हेल्थ एप का इस्तेमाल करते हैं. हेल्थ एप के माध्यम से उपभोक्ता व्यायाम, भोजन, वजन आदि से संबंधित जानकारियां प्राप्त करते हैं.
54 प्रतिशत मरीज हेल्थ से जुड़े सुझावों के लिए ऑनलाइन माध्यम को प्राथमिकता देते हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसे लोगों को स्वास्थ्य सूचनाओं को सामुदायिक स्तर पर प्राप्त करने और साझा करने पर आसानी होती है.
31 प्रतिशत हेल्थकेयर प्रोफेशनल नेटवर्किग के लिए सोशल मीडिया को बड़े माध्यम के रूप में इस्तेमाल करते हैं. फेसबुक, ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किग साइट सूचनाओं के प्रसार में अहम भूमिका निभाती हैं.
41 प्रतिशत लोगों को मानना है कि किसी विशेष डॉक्टर, हॉस्पिटल या किसी विशेष मेडिकल सेवाओं के चयन में सोशल मीडिया का प्रभाव रहता है.
30 प्रतिशत व्यस्क स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों को सोशल मीडिया पर अन्य मरीजों के साथ साझा करते हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार, डॉक्टरों से 47 प्रतिशत लोग, हॉस्पिटल से 43 प्रतिशत लोग, हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी से 32 प्रतिशत लोग और ड्रग कंपनी से 32 प्रतिशत लोग सोशल मीडिया के माध्यम से संपर्क करते हैं.
56 प्रतिशत लोग ऑनलाइन स्वास्थ्य की जानकारियों के लिए वेबएमडी, 31 प्रतिशत लोग विकीपीडिया, 29 प्रतिशत लोग स्वास्थ्य पत्रिकाओं की वेबसाइट, 17 प्रतिशत लोग फेसबुक, 15 प्रतिशत यू-टय़ूब, 13 प्रतिशत लोग स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न ब्लॉग, 12 प्रतिशत पेसेंट कम्युनिटीज और छह प्रतिशत ट्विटर पर जाते हैं.
60 प्रतिशत डॉक्टरों का मानना है कि इलाज प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए सोशल मीडिया की भूमिका भी सराहनीय है.
119 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से विभिन्न हॉस्पिटल की साइट पर यू-टय़ूब ट्रैफिक बढ़ रहा है.
स्नेत : रेफरल एमडी डॉट कॉम
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